”ज्योतिष और कर्म का रहस्य”
ज्योतिष केवल ग्रह-नक्षत्रों की गणना भर नहीं है, यह जीवन की दिशा बताने वाला एक संकेत है। लेकिन एक बात अक्सर लोग भूल जाते हैं – किस्मत से भी बड़ा है कर्म।
अगर आपकी कुण्डली में किसी विशेष योग का अभाव है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि आपको वह चीज़ कभी नहीं मिलेगी। हाँ, आपको जीवन के प्रारंभिक भाग में कठिनाई हो सकती है, लेकिन अगर आपने लगातार प्रयास किया, सच्चे मन से मेहनत की, तो लगभग ५० वर्ष की आयु के बाद उसका फल अवश्य दिखने लगता है। यही असली कर्मफल है।
जीवन को दो हिस्सों में बाँटकर देखिए –
1- भाग्यफल – बचपन और युवावस्था में जो कुछ मिलता है, वह अधिकतर हमारे भाग्य से जुड़ा होता है। जैसे माता-पिता, भाई-बहन, मकान, धन, सुख-सुविधाएँ – ये सब बिना हमारे कर्म के भी प्राप्त हो जाते हैं।
२- कर्मफल – लेकिन जीवन का उत्तरार्ध, विशेषकर ५० की उम्र के बाद, पूरी तरह आपके कर्म पर निर्भर होता है। अच्छे कर्म किए हैं तो जो भी सुख-संपत्ति आपके पास है, वह स्थायी रहेगी और धीरे-धीरे बढ़ेगी। गलत कर्म किए हैं तो चाहे कितनी भी अच्छी कुण्डली क्यों न हो, सब हाथ से निकल जाएगा।
इसलिए ज्योतिषी चाहे कितने भी उपनक्षत्र, अर्गला, माण्डी या नवांश का अध्ययन करें – किसी को यह नहीं कहना चाहिए कि “यह चीज़ तुम्हारी कुण्डली में है ही नहीं।” क्योंकि ये फलकथन ”कथनीय” नहीं है इससे मनुष्य निराश हो सकता है संसार की हर भौतिक वस्तु इंसान कर्म के बल पर पा सकता है कुछ हद्द तक । फर्क बस इतना है कि भाग्यफल और कर्मफल का समय अलग-अलग होता है।
यही कारण है कि ”कर्म को अस्वीकार करना, खुद जीवन को अस्वीकार करने जैसा है।”
भाग्य हमें शुरुआत देता है, लेकिन कर्म ही हमें मंज़िल तक पहुँचाता है।
Sidhant sehgal
Vedic & kpastrologer

