बहुत से लोग दान धर्म इसलिए करते हैं क्योंकि किसी ज्योतिषी ने कहा – “दान करोगे तो तरक्की होगी”, “यह वस्तु दान करो, राजा बन जाओगे”, “गुरुवार को कुछ बाँट दो, धन की वर्षा होगी।”
और फिर जब सालों बाद भी कुछ नहीं बदलता, तो कहते हैं – “सब ढोंग है, सब फालतू है, न ज्योतिष काम आया न दान।”
भाइयों और बहनों, सच्चाई ये है कि दान कोई गारंटी कार्ड नहीं है।
आपका भाग्य आपकी कुंडली और कर्मों से चलता है – और उसमें जितना धन लिखा है, उतना ही आएगा।
अगर आपके ग्रह आपको करोड़पति बनने की अनुमति नहीं देते, तो चाहे आप हर शनिवार को काला कंबल बाँटिए या हर गुरुवार को हलवा – आपकी स्थिति सुधर सकती है, मगर आप अरबपति नहीं बनेंगे।
दान का असली फल “सामाजिक सम्मान” और “आंतरिक शांति” है, न कि बैंक बैलेंस।
जो दिल से, नि:स्वार्थ भाव से दान करता है, उसे समाज में इज़्ज़त मिलती है – भले ही वो करोड़पति न बने।
लेकिन जो स्वार्थ के लिए दान करता है – और फिर फल न मिलने पर भगवान और ज्योतिषी दोनों को गालियाँ देता है – वो न सम्मान पाता है, न संतोष।
दान धर्म कोई रिटर्न पॉलिसी वाला निवेश नहीं है।
ये आत्मा की उदारता है – और उदारता अगर गिनती करके की जाए, तो वो धर्म नहीं रह जाती, वो सिर्फ दिखावा बन जाती है।
इसलिए अगली बार जब दान करें, तो इस उम्मीद में मत कीजिए कि “कुछ बड़ा” मिलेगा।
दान करें… ”क्योंकि आप दे सकते हैं”, न कि इसलिए कि आपको कुछ चाहिए।
वरना आपकी नीयत भी खो जाएगी… और दान का पुण्य भी।

