मूल प्रश्न यह है की कुंडली में नाड़ी दोष हो तो क्या विवाह नहीं करना चाहिए?…
पर कभी-कभी ऐसी स्थिति भी होती है की आप ना नहीं बोल सकते। तो क्या उपाय है? ऐसी कौन सी परिस्थितियां कुंडली में बनती है जिससे नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है। कब एक ज्योतिष नाड़ी दोष होने के बावजूद एक ज्योतिषी विवाह की इज़ाज़त दे सकता है।
मेलापक में भकूट मिलान के बाद नाड़ी मिलान किया जाता है। यह मिलान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है,इसलिए नाड़ी दोष को महादोष की संज्ञा दी गयी है।जिस प्रकार से हम रक्तदान से पहले यह देखते है कि जिसे हम रक्त दे रहे हैं उसका रक्त किस ग्रुप का है क्योंकि गलत ग्रुप का रक्त देने से सामने वाले की मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए ज्योतिष में भी यह देखने के लिए कि भावी वर-वधू का स्वास्थ्य कैसा रहेगा तथा उनसे जो संतान होगी वो कैसी होगी उनमे कोई दोष तो नहीं आएगा। नाड़ी मिलान का आधार जन्म नक्षत्र होता है और इस मिलान में 8 पॉइंट दिए जाते हैं।
कैसे देखते हैं नाड़ी मिलान—नाड़ी मिलान में दो ही स्थितियां होती है वर-वधू की नाड़ी समान होना या अलग-अलग होना। इसलिए इस मिलान में या तो पूर्ण 8 गुण मिलते है या शून्य गुण मिलते हैं, अर्थात वर-वधू की अलग-अलग नाड़ी हो तो शुद्ध नाड़ी मानी जाती है।समान नाड़ी होने पर शून्य गुण मिलते हैं।
शाश्त्रो में कहा गया है कि नाड़ी दोष केवल ब्राह्मण वर्ग में ही माना जाता है। यह कहाँ तक सही है इसका विचार अगर हम अपने अनुभव से करें तो ज्यादा बेहतर होगा।
नाड़ी दोष परिहार-ज्योतिष शाश्त्र में नाड़ी दोष का परिहार निम्न प्रकार से बनता है —
1—वर-वधू का जन्म एक ही राशि व् एक ही नक्षत्र में हो तो नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है, परन्तु नक्षत्र चरण जरुर अलग-अलग होने चाहिए। और इसमे वधू का नक्षत्र चरण वर के चरण के बाद होना चाहिए।
2—वर-वधू की राशि एक हो पर नक्षत्र अलग हो ,परन्तु वधू का नक्षत्र वर के नक्षत्र के बाद आना चाहिए।
3—दोनों की राशि अलग हो पर नक्षत्र एक ही हो किन्तु वधू की राशि वर की राशि के बाद आनी चाहिए।
4—यदि वर अथवा वधू का जन्म नक्षत्र आर्द्रा, रोहिणी, मृगशिरा, ज्येष्ठा, श्रवण, रेवती, उत्तरभाद्र-पद में से कोई है तो नाड़ी दोष नहीं लगता।
5—यदि वर-वधू के राशि के स्वामी गुरु, बुध या शुक्र में से कोई है तो भी नाड़ी दोष नहीं लगता है।
6—साथ ही महामृत्युंजय मन्त्र का जाप भी करवा लेना चाहिए विवाह के पहले।

